क्रोध और साक्षी भाव: अंतस का लावा, साक्षी का अचल किनारा
क्या आपके भीतर उठता क्रोध साक्षी के सामने स्वयं शांत पड़ सकता है? — ख़ुद से पूछें
समंदर के भीतर उठते लावे ने
उसे भीतर तक तपाया,
फिर भी वह राख नहीं बना।
उसी तपिश से जन्मी एक ऐसी ज्वाला,
जो अब बहती नहीं—
तूफ़ानों की दिशा तय करती है।
तुम वही अचल किनारा हो, मालिक,
जिसकी ख़ामोशी के आगे
उसकी गर्जना भी टूट जाती है।
उसे उसका असली स्वरूप दिखाओ—
जो लावा पूरी दुनिया को डराता है,
तुम्हारे साक्षी भाव के पास आकर
महज़ एक शांत लहर बन जाता है।
(यहाँ "मालिक" का अर्थ है भीतर बैठा साक्षी, जो सब देखता है पर बहता नहीं।)
१. जब भीतर लावा उठता है
अपमान, धोखा या छल मिलते ही मनुष्य के भीतर क्रोध उठता है। वह उसे अपने से अलग नहीं देख पाता, इसलिए उसी में बह जाता है। वही तपिश कभी प्रतिशोध बनती है, कभी घृणा, और कभी ख़ुद के ही विरुद्ध पीड़ा।
क्रोध को दबाना नहीं है, और उसके पीछे भागना भी नहीं है। पहले उसे देखना है। जिस क्षण आप क्रोध को देखने लगते हैं, एक सूक्ष्म दूरी बन जाती है:
- • क्रोध एक अनुभव है;
- • देखने वाला उससे अलग है।
यही साक्षी भाव की पहली झलक है।
२. क्रोध की दो दिशाएँ
खेत में आग दो तरह की होती है। एक आग पूरी फ़सल जला देती है। दूसरी आग भट्ठी में ईंट को पकाकर मज़बूत बना देती है। आग वही है, फ़र्क़ दिशा का है। क्रोध भी ऐसा ही है।
- • पहला क्रोध: मोह और स्वार्थ से उठता है। वह भीतर से अंधा कर देता है और सत्य पर झूठ का पर्दा डाल देता है। दुर्योधन का क्रोध ऐसा ही था। उसने उसे अपना ही विनाश दिखने नहीं दिया।
- • दूसरा क्रोध: दृष्टा से उठता है। जब अपने साथ हुआ अन्याय साफ़ दिखता है, पर विवेक बना रहता है। वहाँ क्रोध अंधा नहीं करता, दिशा देता है।
पर यह कसौटी ख़ुद पर ईमानदारी से लगानी पड़ती है, क्योंकि हर आदमी अपने क्रोध को "सच का क्रोध" ही कहता है। एक ही प्रश्न काम आता है: "यह क्रोध मेरे स्वार्थ के लिए उठा है, या सत्य के लिए?"
३. तपिश को दिशा मिलती है
दुःख, अपमान और छल से बच जाना साधना नहीं है। उनके बीच अपनी चेतना को खोने से बचाना साधना है।
साधक के भीतर भी क्रोध उठता है, प्रतिशोध की इच्छा भी उठती है। फ़र्क़ इतना है कि वह हर उठती तरंग के साथ बह नहीं जाता। वह उसे देखता है।
विवेक क्रोध को मिटाता नहीं, उसे समझने की दृष्टि देता है। तब वही तपिश विनाश की जगह जागरूकता की ऊर्जा बनती है, और बहना छोड़कर दिशा तय करने लगती है।
४. अचल किनारा
कोलाहल को कोलाहल से शांत नहीं किया जा सकता। आग को आग से बुझाने पर वह और भड़कती है। जब सामने वाला पूरी गर्जना के साथ खड़ा हो, तब हर प्रतिक्रिया का उत्तर प्रतिक्रिया से देना ज़रूरी नहीं।
अचल किनारा लहरों से लड़ता नहीं और अपनी जगह से हटता भी नहीं। लहर आती है, टकराती है, लौट जाती है।
इसी तरह भीतर प्रतिक्रिया उठ सकती है, पर आप उसे तुरंत अपना निर्णय न बनने दें। विवेक से जन्मा मौन कायरता नहीं, जागरूकता है।
५. लावा कैसे शांत होता है
क्रोध उठता है, आप देखते हैं। अपमान की पीड़ा उठती है, आप देखते हैं। प्रतिशोध की इच्छा उठती है, आप उसे भी देखते हैं। फिर एक प्रश्न सामने आता है:
"जो इन सबको देख रहा है, क्या वह स्वयं इनमें से कोई एक है?"
जो लावा पहले आपको बहा ले जाता था, वह अब आपकी चेतना के सामने एक उठती हुई तरंग भर दिखता है। तरंग को रोकना आवश्यक नहीं; उससे ख़ुद को पहचानना छोड़ना आवश्यक है। यहीं लावा शांत लहर बनने लगता है।
६. एक ईमानदार बात
यह अभ्यास पहली बार में नहीं सधता। अक्सर क्रोध बीत जाने के बाद याद आता है कि देखना था। यह भी ठीक है।
आज देर से देखा, कल थोड़ा पहले देखेंगे। दूरी धीरे-धीरे बनती है।
निष्कर्ष
भीतर उठने वाले उद्वेगों से लड़ना नहीं है, और उनसे भागकर भस्म भी नहीं होना है। उन्हें देखना है, और पूछना है: "जिसे मैं देख रहा हूँ, क्या मैं वही हूँ?"
जब यह प्रश्न अनुभव बन जाता है, तब प्रतिक्रिया और साक्षी के बीच दूरी जन्म लेती है। उसी दूरी में विवेक जागता है। आप समुद्र से भागते नहीं, बस अपने भीतर का अचल किनारा पहचान लेते हैं। यही साक्षी भाव की शुरुआत है।
लेखक: गुरु आत्माराम | अगम चेतन
कर्मयोग से जीवन दर्शन पर 10 वर्षों से निरंतर लेखन। विपत्तियों में तपती चेतना से जन्मे अनुभवों को शास्त्र की नहीं, अनुभव की भाषा में कहना ही उद्देश्य है।
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॥ गुरु आत्माराम ॥
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