मेरे दुःख का कारण मैं ही था - समाधान बाहर नहीं, भीतर है
समस्या भीतर थी, उलझता रहा बाहर | मेरे दुःख का कारण मैं ही था
दूसरे की नीयत का बोझ हम क्यों ढोते हैं? — ख़ुद से पूछें
मेरे दुःख का कारण मैं ही था,
नीयत दूसरों की थी—उसका बोझ ओढ़ लिया मैंने।
ख़ुद को तो बदल नहीं सकता था,
मैं निकला था लोगों को बदलने।
समस्या भीतर थी,
उलझता रहा बाहर की दुनिया में।
नाहक उलझा था अंधकार से, बिना दीपक जलाए।
काश! पहले विवेक को जगा लिया होता—
तो समस्या बाहर नहीं, वहीं भीतर खत्म हो गई होती।
हमारे जीवन में बहुत-से दुःख ऐसे होते हैं, जिनकी शुरुआत किसी दूसरे के व्यवहार से होती है; किंतु उनका बोझ हम जीवन भर अपने भीतर ढोते रहते हैं।
किसी ने धोखा दिया—तो हम सोचते हैं कि उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? किसी ने अपना व्यवहार नहीं बदला—तो हम सोचते हैं कि वह सुधरता क्यों नहीं? किसी ने हमारी अपेक्षा के अनुसार आचरण नहीं किया—तो हम बार-बार उसी बात को मन में दोहराकर स्वयं को घाव देते रहते हैं।
दूसरे का व्यवहार हमारे नियंत्रण में नहीं था, फिर भी उसके बदलने की उम्मीद की कमान हमने अपने हाथ में ले ली। यहीं से दुःख की एक लंबी और व्यर्थ यात्रा शुरू होती है।
१. नीयत दूसरों की थी—उसका बोझ ओढ़ लिया मैंने
दूसरे की नीयत, उसका स्वभाव और उसका आचरण हमारे अधिकार में नहीं है। किंतु उसने हमारे साथ क्या किया, उसके बाद हम अपने भीतर क्या पालकर बैठते हैं—यह पूरी तरह हमारी अपनी जिम्मेदारी है।
धोखा देने वाला अपना कर्म करके चला गया, किंतु हम उसके व्यवहार को बार-बार याद करके उस घाव को अपने भीतर जीवित रखते रहे। हमने दूसरे की कुत्सित नीयत का भारी बोझ अपने ही मन पर ओढ़ लिया।
इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि दूसरे की गलती हमारी गलती बन गई; इसका मर्म केवल इतना है कि उसकी भूल के बाद अपने ही भीतर लगातार जलते रहना हमारे दुःख को कई गुना बढ़ा देता है।
२. ख़ुद को तो बदल नहीं सकता था, मैं निकला था लोगों को बदलने
मनुष्यों की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यही है—जिसे बदलना हमारे हाथ में है (अर्थात स्वयं का मन), उसके सामने हम हार मान लेते हैं। और जिसे बदलना हमारे वश में नहीं है, उसे बदलने की जिद्दी हठ पकड़ लेते हैं।
हम चाहते हैं कि दूसरा समझदार हो जाए, दूसरा ईमानदार बन जाए, दूसरा अपना व्यवहार बदल ले और हमें समझे। किंतु 'दूसरा हमारे अनुसार जीवन जिए'—यह अपेक्षा ही हमारे नए दुखों का कारण बन जाती है।
हम अपने मन की दिशा बदल सकते हैं, अपनी अपेक्षाओं का निरीक्षण कर सकते हैं और अपनी प्रतिक्रियाओं को शांत कर सकते हैं; फिर भी हम अपनी पूरी ऊर्जा दूसरे को सुधारने में व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं।
३. समस्या भीतर थी, उलझता रहा बाहर की दुनिया में
यह इस पूरे दर्शन का केंद्रीय बिंदु है।
बाहर की घटना केवल एक तटस्थ घटना थी। उस घटना के साथ मन ने जो झूठे अर्थ जोड़े, जो अपेक्षाएँ पालीं, जो तीखे प्रश्न दोहराए और जिस पीड़ा को कसकर पकड़कर रखा—यहीं से भीतर की असली उलझन पैदा हुई।
इसलिए समस्या को केवल बाहर खोजते रहने से कभी समाधान नहीं मिलता। बाहर का व्यक्ति बदल भी जाए, तो यह अशान्त मन तुरंत एक नई समस्या खोज लेगा। आज एक व्यक्ति से शिकायत है, कल दूसरे से होगी; आज धोखे की पीड़ा है, कल सम्मान न मिलने की।
यदि मन अपनी अपेक्षाओं और प्रतिक्रियाओं को साक्षी होकर देखना नहीं सीखता, तो केवल समस्या के चेहरे बदलते रहेंगे—पीड़ा जस की तस बनी रहेगी।
४. नाहक उलझा था अंधकार से, बिना दीपक जलाए
अंधकार को केवल कोसते रहने से अंधकार समाप्त नहीं होता—दीपक जलाना पड़ता है। ठीक उसी तरह, संसार की हर परिस्थिति को दोष देते रहने से मन का कोलाहल शांत नहीं होता।
आंतरिक दीपक जलाने के लिए सबसे पहले स्वयं से ये तीखे प्रश्न पूछने पड़ते हैं—
- • मैं किस असत्य अपेक्षा को पकड़कर दुखी हो रहा हूँ?
- • मैं बार-बार उसी व्यक्ति से सही परिणाम की आशा क्यों कर रहा हूँ, जो बार-बार अपना असली स्वभाव दिखा चुका है?
- • मैं दूसरे के बदलने की प्रतीक्षा में अपने वर्तमान के कीमती क्षणों को क्यों जला रहा हूँ?
यही आत्म-विश्लेषण भीतर विवेक का दीपक जलाता है। विवेक का अर्थ केवल सही और गलत की सूची बनाना नहीं; विवेक का अर्थ है—यह स्पष्ट देख पाना कि क्या मेरे हाथ में है और क्या मेरे हाथ में नहीं।
दूसरे का कर्म, उसकी नीयत और उसका स्वभाव हमारे हाथ में नहीं है। किंतु अपनी दृष्टि, अपनी अपेक्षा, अपनी प्रतिक्रिया और अपने मन की दिशा को देखना पूरी तरह हमारे हाथ में है।
५. समाधान परिस्थिति का नहीं, दृष्टि का रूपांतरण है
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हम अन्याय सहते रहें, गलत व्यक्ति को गलत न कहें या आवश्यक कार्रवाई छोड़ दें। इसका सीधा अर्थ यह है कि बाहर जो व्यावहारिक कदम उठाना अनिवार्य है, वह अवश्य उठाएँ; किंतु अपने आंतरिक जीवन की चाबी किसी दूसरे के आचरण को न सौंपें।
क्योंकि सबसे बड़ा बंधन वह नहीं जिसमें कोई दूसरा हमें बाँधता है; सबसे भयानक बंधन वह है जिसमें हम अपनी आत्मिक शांति का नियंत्रण दूसरों के हाथों में दे देते हैं।
हम आधी ज़िंदगी उन लोगों को बदलने में गँवा देते हैं, जिन्हें बदलना हमारे हाथ में कभी था ही नहीं; और जिस मन को बदलने की पूर्ण कमान हमारे पास थी, उसे देखना ही भूल जाते हैं।
समाधान कभी बाहर से नहीं आता। कई बार बाहर की विषम परिस्थितियाँ बिल्कुल वैसी ही बनी रहती हैं, किंतु भीतर विवेक का दीपक जल जाता है। और जब भीतर का दीपक जलता है, तो परिस्थिति से पहले—उस परिस्थिति को देखने वाली हमारी दृष्टि सदा के लिए बदल जाती है।
आत्म-निरीक्षण और विवेक (निष्कर्ष)
इस आत्म-दर्शन का सार यही है कि दूसरे का व्यवहार हमारे हाथ में कभी नहीं था, पर उसके बाद हम अपने भीतर क्या पालते हैं—यह हमेशा हमारी अपनी जिम्मेदारी रहती है। जब हम अपनी अपेक्षा और प्रतिक्रिया को साक्षी भाव से देखना सीख लेते हैं, तब बाहर की परिस्थिति वही रहते हुए भी, उसे देखने वाली हमारी दृष्टि सदा के लिए बदल जाती है।
लेखक: गुरु आत्माराम | अगम चेतन
कर्मयोग से जीवन दर्शन पर 10 वर्षों से निरंतर लेखन। उद्देश्य - शास्त्र को अनुभव की भाषा में कहना, अंधभक्ति को काटना और साक्षी भाव जगाना।
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© अगम चेतन | www.guruatmaramsutra.com
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